सोनपुर मेला और इतिहास || Sonpur Mela History

भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है। यहां आपको विभिन्न धर्म के लोग, विभिन्न भाषा के लोग,  विभिन्न समुदाय के लोग, विभिन्न रंग रूप के लोग मिल जाएंगे किंतु भारत में विविधता और भी है वह चाहे क्षेत्रीय स्तर की हो, धार्मिक हो सामाजिक हो या भौगोलिक हो।
Sonpur mela 

 विश्व के पटल पर भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां पर विविधताओं की भरमार है और यहां पर धर्म से लेकर समुदाय से लेकर तरह-तरह की चीजें आपको एक ही स्थान पर मिल जाएगा।

 आज हम आपको वैसे ही भारत के एक चीज के बारे में बताने वाले हैं जो विश्व के पटल पर अपना स्थान बहुत ही गौरवान्वित रूप से रखता है और बहुत ही प्रबल स्थान रखता है।

 साथियों आज हम भारत के सोनपुर मेला यानी हरिहर क्षेत्र मेला के बारे में बताने वाले हैं उसके इतिहास के बारे में आपको अवगत कराने वाले हैं और विश्व के पटल पर और इतिहास की गहराई में कितनी अंदर है यह मेला और क्या-क्या चीजें होती है इस मेले में क्या मान्यताएं हैं यह सारी चीजें इस आर्टिकल में आज हम आपको बताने वाले हैं।

 सोनपुर मेला जो कि बिहार के राजधानी पटना से मात्र 20 किलोमीटर उत्तर की तरफ सोनपुर जो गंगा और गंडक के किनारे बसे एक सुंदर सा क्षेत्र पर यह लगने वाला मेला है।  सोनपुर जंक्शन से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर है मेला लगता है। यह मेला प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के मध्य रात्रि से शुरू हो जाता है और विगत 28 से 30 दिन यानी कि लगभग 1 महीने तक यह मेला चलता है।

 यह मेला एशिया के सबसे बड़े पशु मेला के रूप से विश्व भर में विख्यात है और प्रत्येक वर्ष यहां पर लाखों पर्यटक इस मेले की खूबसूरती को देखने आते हैं जो कि आगे हम आपको बताएंगे।
 इस मेले में पशु पक्षी गाय भैंस बकरी ऊंट हाथी बैल भेड़ कुत्ते तरह तरह के पक्षी  आते हैं।
 भले ही आज का सोनपुर मेला बहुत ही संकीर्ण हो गया है किंतु पहले ऐसा था कि यह मेला आप हफ्ते भर में भी नहीं घूम सकते थे इतना बड़ा यह मेला लगता था ।
 मेला क्यों लगता है और कब से लगता है इसका तो कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है और हमारे खोज में भी यह साबित नहीं हो पाया है किंतु लोक मान्यताओं और तथ्य के आधारों पर यह मेला हजारों वर्ष पुराना है।
 सोनपुर और उसके आसपास के जितने भी क्षेत्र थे जितने भी बुद्धिजीवी लोग थे जो भी पुराने लोग थे उन लोगों से हमने इस चीज के बारे में जाने की कोशिश की और सोनपुर और मेला पर जो भी किताबें थी हमने सभी को खंगाला पढ़ा और समझा तब जाकर हमें पता चला कि वाकई में मेला बहुत ही पुराना है और कुछ अपवाद भी है।

मेला से जुडी कहानी -

 कुछ मान्यताओं की बात करें तो द्वापर में यहां पर गज और ग्राह यानी हाथी और मगरमच्छ का भीषण युद्ध हुआ था, हाथी पर मगरमच्छ भारी पड़ रहा था और अपने मृत्यु को निकट देखकर गज ने भगवान विष्णु का आह्वान किया और भगवान विष्णु ने उसे बचाने के लिए यहां पर आए थे और अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह यानि मगरमच्छ का वध किया था  और लोक कथाओं के अनुसार जो भी हाथी पालक थे वह श्रद्धा पूर्वक यहां पर आने लगे और यह तिथि था कार्तिक पूर्णिमा का ही दिन जिस तिथि पर या मेला आज भी भव्य रूप से लगता है।

 इतिहास के जानकार बताते हैं कि भारत में जब कृषि का विकास हुआ तब बैलों का महत्व बढ़ गया क्योंकि कृषि कामों में बैल जूते सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पशु था और सोनपुर जोकि दो नदियों का संगम है गंगा और गंडक के स्थित पर यह मेला लगता है,
 और पुराने जमाने में लोग दूर-दूर के सफर को जलीय मार्ग द्वारा ही करते थे और सोनपुर और खास करके जो पहलेजाघाट है जो सोनपुर से महज 8 से 10 किलोमीटर यह भारत का एक प्रमुख बंदरगाह था,
 और आपको बता दें कि यहां पर बलों के हजारों नस्ल यहां पर आया करती थी मेले में और यहीं से खरीद बिक्री बैलों का होता था।
 आधुनिक में जो मेला का परिवेश है वह महज 1 से 3 किलोमीटर की दूरी में ही लगता है, किंतु यहां के स्थानीय लोग बताते हैं कि वह मेला 12 कोस में लगाकर तथा है यानी 36 किलोमीटर का यह एरिया कवर करता था।
 पूरब में गंडक पार हाजीपुर, पश्चिम में दिघवारा, उत्तर में कल्याणपुर शिकारपुर, दक्षिण में गंगा के किनारे तक यह मेला फैला हुआ था।

 वही पहले मेला मात्र 2 से 3 दिन का ही लगा करता था, कार्तिक पूर्णिमा के मध्य रात्रि से ही लाखों लाख में लोग नारायणी नदी में स्नान कर बगल के ही विश्व प्रसिद्ध हरिहर नाथ मंदिर में जलाभिषेक करते थे और कुछ मेला देखते थे कुछ खरीद बिक्री करते थे और  घर लौट जाते थे।

 मेला की आरंभिक तिथि -

 मेला की आरंभिक तिथि वर्ष ऐसा कुछ भी प्रमाणित रुप से नहीं है किंतु कई ऐसे पौराणिक  ग्रंथ किताबों में सोनपुर मेला का जिक्र हुआ है हालांकि नाम कुछ अलग रहा है,
 उन्हीं में से एक किताब में हमने पढ़ा कि 300 ईसा पूर्व  सोनपुर मेला अपने यौवन पर था यानी अपनी जवानी के दिन में था, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि इस आधार पर मेला तकरीबन अपनी जवानी तक पहुंचते-पहुंचते 2500 से 2800 बरस का हो चुका था।

 वहीं हमने सोनपुर के एक लाइब्रेरी से एक किताब सोनपुर नामा को पढ़ा, उसमें हमने लिखा हुआ पाया कि सोनपुर मेला का उदय 1822 के आसपास हुआ है जो कि हाजीपुर में लगा करता था,
 फिर 1830 में यह मेला को अंग्रेजों ने किसी कारण सोनपुर स्थानांतरण कर दिया।
 हाजीपुर के ही कुछ लोगों से जानकारी प्राप्त करने पर पता चला कि हाथी शाहगंज जो कि हाजीपुर का ही एक जगह है वहां पर हाथियों का मेला लगता है, जो आज के परिवेश में उसका नाम बदलकर हाथसरगंज कर दिया गया है।
 जोहरी बाजार जो गंडक पुल से शुरू होकर गांधी चौक तक  है यह स्वर्ण और आभूषणों का क्रय विक्रय वाला बाजार था।
 लेकिन हाजीपुर और सोनपुर को जोड़ने वाली जो पुल है उसका निर्माण अट्ठारह सौ छियासी में हुआ और इतना बड़ा मेला का स्थानांतरण करना शायद से संभावना रहा हो और दार्शनिक लोगों के लिए यहां तक पहुंचना जलीय मार्क से काफी मुश्किल भरा रहा होगा और बहुत ही ज्यादा खर्चीला भी रहा होगा।

मेले मे आने वाले महत्वपूर्ण लोग -

सोनपुर मेला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी एक अहम हिस्सा रहा था  चुकी वैश्विक स्तर पर यह मेला का महत्व था और यहां पर भारत के विभिन्न कोणों से बड़े-बड़े क्रांतिकारी आया करते थे और यहां पर अपने पिछले वर्ष के किए गए कार्यों की समीक्षा करते थे और अगले वर्ष करने वाले कार्य यानी कि स्वतंत्रता संग्राम में जो भी कार्य करने थे उसका यहां पर खाका बनाया करते थे,
 भारत के शीर्ष क्रांतिकारी यहां पर आ चुके हैं जिसमें महात्मा गांधी सब पत्नी कस्तूरबा,  वीर कुंवर सिंह, राजेंद्र प्रसाद,  जयप्रकाश नारायण, मटुक बिहारी लाल, वीपी कोएराला, नरेन्द्र देव, मालवीय जी,
इतिहासकार बताते है की मेले मे देश क़े तमाम क्रन्तिकारी आये हुए है जिनमे भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर, लाल राजपट राय, शुभाष बाबु, नेहरू प्रमुख है चूकि मेले क़े पूरब और दक्षिण की ओर दो विशाल नदी एकदम से जज़दीक से होकर गुज़रती है और यह सारा मीटिंग सोनपुर क़े हरिहरनाथ मंदिर क़े पीछे एक अति प्राचीन मठ मे हुआ करता था मठ से महज़ कुछ की कदम की दूरी पर गंगा नदी बहती है, जिस कारण अगर अंग्रेजी अफसर आते तो झट से क्रन्तिकारी गांव क़े सहारे मध्य नहीं मे चला जाया करते थे।
मेले मे कई महत्वपूर्ण संधि हुई है जिसमे सुघौली संधि सबसे महत्वपूर्ण रहा है।
आपको बता दे यहाँ कई राजा भी आ चुके है जिसमे भारत क़े विभिन्न राजाओं क़े साथ साथ अफगानिस्तान, ताज़ाकिस्तान, यूनान, नेपाली राजा भी इस मेले को देखने आ चुके है।

मेले मे बिकने वाले वस्तुएँ (आरंभिक काल से आधुनिक काल तक)-

मेले मे पशु ही नहीं अनेकों चीजों का व्यापार हुआ करता था और व्यापारी भी दूर देशों से आते थे।
कश्मीर, अफगानिस्तान से गर्म कपड़ों क़े व्यापारी आया करते थे,
ईरान से लड़कियां चाकू बेचने आया करती थीं, उनकी चाकू यार खंजर की माँग बहुत ज्यादा था, अपने कमर मे खंजर रख विभिन्न कर्तब दीखते घूमते चाकू बेचा करते थे।
नेपाल से लकड़ियों पर सुन्दर भगवान क़े बनी कलाकृति बेचने आते थे, अफगान से अनेकों नस्ल क़े भेड़-बकरिया आया करती थीं।
असम से हाथी आया करते थे, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश से भारतीय  नस्लों क़े भेड़ बकरी और कुछ गाय आया करती थीं, हरियाणा - पंजाब से अनाज बेचने आया करते थे।
अर्थात देश और विदेश क़े कोने कोने से व्यापारी आया करते थे और क्रय-विक्रय किया करते थे।

आधुनिक परिवेश मे मेला -

आधुनिक परिवेश मे मेला बहुत बदल चूका है और बहुत ही छोटा हो गया,
मेले मे अब पशु बहुत कम या न क़े बराबर आते है।
आधुनिक काल मे मेले मे बहुत चीजे जुडी है किन्तु अपनी पौराणिक महत्व मेला खोटे जा रहा है।
बात करे तो अब बाहरी यानि विदेशो क़े व्यापारी या ग्राहक नहीं आते है। और पहले क़े अपेक्षा बहुत कम चीजे बिकती है।
मेले मे सबसे ज्यादा आपको थियेटर मिलेगा जिसमे नृत्ययँगना नृत्य करती, सरकरी स्टॉल जिसमे राज्य और केंद्र क़े कार्यों की जानकारी, मीना बजार जिसमे छोटेमोटे गरेलु चीजे, पलंग, अलमीरा, कुर्सी यानि फर्नीचर क़े सारे समान, मिठाईया, होटल, कपड़ो की दुकान, रेल ग्राम प्रदर्शिनीं, क़ृषि ग्राम, जनसुविधा केंद्र, स्थानीय लोककला क़े स्टॉल, जादूगर, मौत का कुआ, छोटे बड़े झूले आदि प्रकट क़े चीज देखने और खरीदने को मिल जायेगा।

मेला पतन की ओर बढ़ने का कारण -

मेला पतन की ओर बढ़ता जा रहा है, इसका सबसे बड़ा मुख्य कारण भारत में पशु कानून के कारण हो रहा है, इस एक्ट के तहत पशुओं की खरीद बिक्री नहीं की जा सकती है और साथ ही साथ इस मेले में देश ही नहीं विदेशों से पशु पक्षी आया करते थे और दूर-दूर से जब पशु पक्षी आते हैं देश के विभिन्न कोने से तो एक लंबी यात्रा करके आते थे और सरकार ने इसे यह कहकर रोक लगा दिया गया कि लंबे सफर और लगातार सफर करने से पशुओं पर अत्याचार हो रहा है अतः मेले में पशु पक्षी पर बिक्री पर रोक लगा दे गई,
 दूसरी वजह बताया जाता है कि पहले मेले में सबसे ज्यादा बैल आया करते थे चुकी बैल कृषि कामों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाला जानवर था पशुपालक बैल के साथ-साथ अन्य जानवर भी लाया करते थे इसी पायल के कारण।
 किन्तु आधुनिकरण और टेक्नोलॉजी के आने से इनका महत्व घटता गया और धीरे-धीरे मेले में बैल आने बंद हो गए यह भी एक बड़ा कारण बताया जाता है मेले के पतन का जो खास करके पशुओं के आधार पर मेला है।

 मेला को बचाने के लिए क्या क्या कदम उठाए जा सकते हैं -

 मेले को अगर पौराणिक रंग रूप देना है तो कुछ कदम उठाए जा सकते हैं।
  •  सबसे पहले तो वह पशु कानून को रद्द करना होगा जिसके कारण पशुओं की खरीद बिक्री पर अंकुश लग चुका है,
  • राज्य और केंद्र सरकार को विशेष रूप से इस पर ध्यान देना चाहिए और उसका प्रचार प्रसार पुनः करना चाहिए,
  •  बहुत ऐसी चीज है आधुनिकता यह है जिसे दिखाकर आप विदेशी और देशी पर्यटकों को लुभा सकते हैं
  • कुछ लोगों ने जिस प्रकार से मेले के भूमि को अधिग्रहित कर लिया है उसे अधिग्रहण को उनके चंगुल से हटाना चाहिए।
  •  बाहर से आने वाले व्यापारी,  खास करके जो जानवरों के व्यापारी हैं उनको अतिरिक्त सुविधा देनी चाहिए यात्रा के दृष्टिकोण से रहने क़े दृष्टिकोण से और जो उन्हें जमीन दी जाती है, भारी कीमतों पर उसे या तो बहुत कम कर देना चाहिए या तो मुफ्त कर देना चाहिए।
  •  मेले में जो भी जानवरों से संबंधित प्रतियोगिता कार्यक्रम होती थी उसे पुनः चालू करना चाहिए।
  •  कला मंच पर भारत ही नहीं वैश्विक स्तर के कलाकारों को आमंत्रित करना चाहिए।
  •  प्रचार प्रसार और व्यापार के नए-नए आयामों को जोड़ना चाहिए।
  •  जो भी नए-नए चीज है दुनिया में हो रही है उस चीजों को यहां पर दिखाना चाहिए जो भी घटनाएं है ग्लोबल वॉर्मिंग होंगे वैश्विक स्तर की हर समस्या हर अविष्कार को यहां पर उस को विस्तार रूप से लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए जिससे देशी-विदेशी पर्यटकों में रूचि बढ़ेगी यहां पर आने के लिए।
  •  कुछ मुफ्त सुविधाएं भी यहां पर मुहैया करवाना चाहिए जैसे कि सोनपुर मेले से रिलेटेड जो कुछ किताबे छुपानी चाहिए उसके महत्व के बारे में लोगों को बताना चाहिए
  •  मेले में कुछ मुफ्त सुविधाएं भी होनी चाहिए, जो इतिहास से जुड़ी हो और पौराणिक कथाओं पर आधारित हो।
  •  और मेले का डिजिटलाइजेशन भी करना चाहिए।

मेले से जुड़े हुए कुछ रोचक तस्वीर -
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मीना बाज़ार 

sonpur mela arkeshtra
सोनपुर मेले का थियेटर का एक दृश्य 

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गजग्राह 
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घोड़ा दौर प्रतियोगिता 
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हाथी प्रेम 
 मेला पहुंचने का सही मार्ग -

 अगर आप हरिहर क्षेत्र यानी सोनपुर मेला में आना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको बिहार कि राजधानी पटना मे आना होगा।
आप पटना से आप सोनपुर आने के लिए दो मार्ग का चयन कर सकते हैं। गांधी सेतु पुल के सहायता से आप हाजीपुर आ सकते हैं वहां से फिर आपको सोनपुर मेले में आ सकते हैं,
 दूसरा मार्ग आप पटना से जेपी सेतु यानी सोनपुर-दीघा पुल से सीधे मेले में आ सकते हैं,
 यहां तक कि सोनपुर आने के लिए रेल मार्ग के द्वारा राज्य के विभिन्न जगहों से ट्रेनें चलती है उससे भी आप आसानी से आ सकते हैं।
 अगर आप आ रहे हैं या आने वाले हैं कुछ दिक्कत हो तो आप कमेंट करके हमें बता सकते हैं या हमारे चैनल से जुड़ सकते हैं या आप फेसबुक इंस्टाग्राम कहीं भी मैसेज कर सकते हैं हम हर संभव आपकी मदद करेंगे।


 बेहद खूबसूरत और इस ऐतिहासिक पशु मेला को बचाने के लिए आप एक काम कर सकते हैं, यह आर्टिकल लोगों तक ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि लोग जान सके इसका वास्तविक महत्व और सरकार पर दबाव पड़े इसक़े पौराणिक स्वरूप दिलाने के लिए।

 और भी बहुत चीजें है जो आगे क्या आर्टिकल में आपको मिलेगी सोनपुर मेले से रिलेटेड।

धन्यवाद।
(लेखन -गौतम राज़) 

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