वामन अवतार, बौना पोखरा || Bauna Pokhar History

 वामन पोखरा-वैशाली 
ग्रामीण इसे बौना पोखरा भी कहते, 
चूकि विष्णु जी का यह अवतार है साथ ही छोटे ब्राह्मण के रुप मे इसलिए इसे बौना अवतार कहा जाता है, 

पोखरा की इतिहास 
जब हमने खोजबीन की तो पता चला वैशाली के इसी स्थान पर राजा बली ने वामन ब्राह्मण को 3 कदम भिक्षा स्वरुप दान मे दिया था, 
मन्दिर अति प्राचीन है और इसका इतिहास बहुत पुराना है, 
बात करे मन्दिर  की तो यह खजुरिया ईटों से बना है इस प्रकार के ईट बुद्ध कालीन हुआ करते थे और अशोक के समय यह बनना बंद हो गए थे, 
लोगों से पूछने पर हम ठीक-ठीक जानकारी नहीं मिल सकी, की आखिर मंदिर कितना पुराना है। 
मंदिर के अंदर चार मुर्तिया है जो अपने युग की कहानी कहती है। 
दाहिने तरफ गणेश जी की प्रतिमा आप को दिख जाएगी, बगल मे भगवान विष्णु और बाये ओर नव दुर्गा की एक ही पत्थर मे मूर्ति मिल जाएगी और ठीक बगल मे वामन देव की मूर्ति आपको दिख जाएगी। 
गर्वगृह के बिच मे से एक मूर्ति गायब है जिसे किसी चोर ने चुरा लिया है, बताया जाता है यह मूर्ति भगवान शंकर और माता गौरी की प्रतिमा थीं। 
मूर्ति काले पत्थर के बने है जो बुद्ध कालीन बताया जाता है किन्तु थोड़ा आप मूर्ति पर गौर करेंगे तो यह आपको बुद्ध कालीन से भी पुरानी देखने मे लगेगी। 

वामन पोखरा / बौना पोखरा 
मदिर के बाये ओर आपको एक विलुप्त अवस्था मे कुंड मिलेगा जिसे बौना कुंड बताया जाता है, 
बताया जाता की वामन देव ने राजा बलि से भिक्षा के पहले इसी कुंड मे स्नान किया और पूजा अर्चना भी की, 
पुजारी का दावा यह भी कहता है की राजा बलि ने त्रिलोक विजय यज्ञ भी यही कराया था। 
खैर सच्चाई जो भी पर यह कुंड आज मृत अवस्था मे पहुंच गया है, 
चारो तरफ जलकुण्डि का पौधा ने कुंड को अपने गिरफ्त मे कर रखा है। 
गन्दगी का अंबार इस ऐतिहासिक कुंड को अपने गुमनाम दुनिया मे बड़ी तेजी से लेते जा रहा है और संभव है आने वाले 5-10 साल मे यह कुंड पूरी तरह ख़तम हो जाये और हम सिर्फ कहानियो मे ही इसे सुन पाएंगे। 

वामन देव की कहानी और तथ्य -

वामन अवतार विष्णु के चौथे अवतार है और त्रेता के प्रथम अवतार साथ ही साथ यह प्रथम अवतार है जिसमे भगवान विष्णु एक साधारण मनुष्य के रुप मे अवतरित हुए थे। 
राजा बलि ने अपने तपो बल से तीनो लोक के जीत लिया था, जिसमे देव इन्द्र का स्वर्ग लोक भी था। 
आपको बताते चले की राजा बलि अशुरराज थे किन्तु एक दानवीर राजा थे, 
राजा बलि प्रहलाद/प्रह्लाद के पौत्र थे। 
देवेंद्र के इन्द्रलोक को बलि से छुड़ाने के लिए विष्णु ने यह अवतार लिया। 
राजा बलि जब अस्वमेध यज्ञ करावा रहे थे तभी वामन वहां पहुचे और खुद के रहने के लिए मात्र 3 कदम भूमि भिक्षा मे मांगी। 
राजा बलि ने बामन देव के कद को कम आका और तीन कदम भूमि देने की वचन दे दिया। 
अशूर गुरु शुक्रयाचार्य ने बलि को आगाह भी किया की यह देवताओं का चाल हो सकता है किन्तु दानवीर वीर राजा शुक्राचार्य की बातों ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया 
राजा बलि वामन देव को भिक्षा देते हुए। 

वचन के उपरांत ही वामन देव ने अपना विक्राल रुप दिखाया और आकाश से भी उची उनका कद हो गया। 
एक कदम मे पृथ्वी लोक और ब्रह्माण्ड, दूसरे कदम मे पूरा देव लोक अब तीसरा कदम के लिए सृष्टि मे कही जगह बचा ही नहीं, किन्तु दानवीर राजा बलि ने अपने वचन का निर्वाहन का प्रण लिया और तीसरा कदम राजा बलि ने खुद के सर पर रखने को कहा। 
राजा की दरिया दिली देख वामन देव प्रसन्न हुए और बलि को पाताल लोक का राजा बनाकर अपने वास्त्विक रुप मे लौट गए। 
वामन देव की मूर्ति -गुजरात मे। 


साथियों अगर आप वहां जाना चाहते है और दर्शन करना चाहते है तो आप वैशाली जो बिहार का ही एका जिला है। 
पटना से 150 किलोमीटर उत्तर की ओर यह अति प्राचीन और महत्वपूर्ण स्थान है। 
इस आर्टिकल की कथा भगवतगीता और स्थानीय लोगों द्वारा लिया गया है। 
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                              -धन्यवाद-

(लेखन -गौतम राज़)

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