कौनहारा घाट हाजीपुर


 भारत आस्था और आस्था के अनेकों आयामों से जुड़ा हुआ एक धार्मिक और पौराणिक देश है।यहां धर्म के अनेकों आयाम,महत्व, भावना, सद्भावना, विश्वास और रहस्य मिल जाएंगे। जो भारत को विविधता में भी एकता के सूत्र को बनाता है और बांधता है। आज हम इस पोस्ट के माध्यम से एक़ कैसे अत्यंत प्राचीन घाट के बारे में बताएंगे जहां पर चिता कि आग कभी ठंड नहीं होती है और साथ ही साथ वहां पर साक्षात विष्णु का आगमन हुआ था।


कौनहारा घाट का इतिहास -

 सबसे पहले इस घाट की पौराणिक इतिहास के बारे में बात कर लेते हैं।
 गंगा और गंडक के पावन संगम पर यह कौनहारा घाट स्थित है। बात करें इसकी इतिहास की तो इसका प्रमाण द्वापर युग में मिलता है और साथ ही साथ इस का जुड़ाव गज और ग्राह के ऐतिहासिक लड़ाई से मिलता है।
 बताया जाता है कि गज और ग्राह जो कि वास्तव में एक ही माता के गर्भ से उत्पन्न दो भाई थे, जिन्हें ऋषि का श्राप था, जिस कारण एक भाई को ग्राह यानी घड़ियाल और दूसरे भाई को गज यानी हाथी बनना पड़ा और इनके मोक्ष साक्षात विष्णु के हाथ होगा ऐसा वरदान भी दिया गया अंत में।
 पुराना और ऐतिहासिक ग्रंथों की मानें तो गज और ग्राह एक ही जंगल में रहा करते थे एक जंगल में रहता था और दूसरा पानी में रहा करता था।
 1 दिन गज यानी हाथी सुबह-सुबह स्नान कर भगवान की आराधना कर रहा था, तभी ग्रहण है उसके पैर पकड़कर उसे पानी में खींचने लगा।
 एक थल का राजा और दूसरा पानी का राजा, दोनों के बीच में बहुत ही हिंसक और बहुत ही लंबा युद्ध चला।
 बताया जाता है कि यह युद्ध नेपाल के तराई से होते हुए गंडक के रास्ते अभी मौजूद शालिग्राम यानी सोनपुर तक पहुंच गई थी।
 यहां दो नदियों के संगम के कारण पानी बहुत गहरा था।
 गहरे पानी पाकर घड़ियाल ग्रज पर भारी पड़ने लगा और गज को घड़ियाल गहरे पानी में लेकर डुबोने लगा।
 गजा अपनी हार और मृत्यु को पास देख,
 सामने से गुजर रही एक कमल के फूल को अपने शब्दों में लेकर भगवान विष्णु की आराधना करने लगा,
 उसका वर्णन बहुत ही सुंदर दिया गया है ग्रंथों में -

 हे गोविंद राखो शरण अब तो
 नाक कान लागे तू बन को..

 अपने भक्त की मार्मिक पुकार को सुनकर द्वारका में बैठे भगवान कृष्ण नंगे पांव गज का उद्धार करने के लिए प्रकट हो जाते हैं और अपने सुदर्शन चक्र से घड़ियाल का वध कर देते हैं।
 भगवान के शालिग्राम (sonpur) में प्रकट होने की खबर सुनकर सारे ऋषि मुनि वहां पर आने लगे और वहां पर भगवान की पूजा आराधना करने लगे,
 उसी में एक ऋषि कुछ समय देर से पहुंचे जिस कारण वह गंगा उस पार न कर सके जहां पर आज हरिहरनाथ मंदिर स्थापित है।
 और उन्होंने कोनहारा घाट से ही आवाज लगाई कौन जीता।
 फिर वहां से प्रतिउत्तर में जवाब आता है कि गत जीता ग्राह हारा।
 और मान्यताओं के आधार पर इसी वजह से इस घाट का नाम पड़ गया कौनहारा।
 बताया जाता है कि इस घटना से पूर्व भी यहां पर श्मशान घाट हुआ करता था मगर भगवान विष्णु के यहां पर प्रकट होना इस घाट की विकी हाथ में चार चांद लगा दी और साथ ही साथ यहां पर तीन नदियों का संगम हुआ करता था जिसमें से पावन गंगा,  पवित्र गंडक और सोन नदी का संगम यहीं पर हुआ करता था।

कौनहारा घाट पहुंचने का मार्ग -

 कौनहारा घाट पटना से महज 20 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है,
 और इसकी निकटतम हवाई अड्डा पटना हवाई अड्डा ही है।
 और इसकी सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन सोनपुर जंक्शन है जो एक बहुत ही प्रमुख जंक्शन में से एक है।
 आप देश के किसी भी कोने से रेल मार्ग से हाजीपुर या पटना आ सकते हैं,
 हाजीपुर से इस घाट की दूरी महज 3 से 4 किलोमीटर है।
 वही सोनपुर से इसकी दूरी भी तकरीबन 3 से 4 किलोमीटर होगी।
 अगर आप पटना उतरते हैं तो वहां से आप बस या टेंपो के सहारे हाजीपुर पहुंच सकते हैं, फिर वही से टेंपू के सहारे ही आप कौन हारा घाट जा सकते हैं।

आधुनिक परिवेश -

 बात करें कौनहारा घाट के आधुनिक परिवेश की तो यह अब बिहार का एक प्रमुख श्मशान घाट बन चुका है।
 यहां पर प्रदेश के विभिन्न जिलों से लोग यहां पर अंतिम क्रिया कर्म के लिए आते हैं।
 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस घाट पर अंतिम क्रिया कर्म करने से दिवंगत की आत्मा को शांति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है।
 यहीं पर कई सारे मंदिर भी आपको मिल जाएंगे जो कि इसी घाट से संबंध रखते हैं।
 यहां पर दो या तीन मेले का आयोजन भी होता है जिसमें से प्रमुख है कार्तिक पूर्णिमा का मेला यानी कि एक तरह का शाही स्नान जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु श्रद्धा की डुबकी लगाते हैं गंडक और गंगा के संगम में।
 वहीं पर सोनपुर मेले के कारण भी एक महीना तक इस घाट पर बहुत ज्यादा भीड़ देखी जाती है।
 आपको बताते चलें कि इस समस्या घाट पर 1 दिन में औसतन 50 से 60 लाशें जलाई जाती है जो कभी-कभी बढ़कर 100 से ऊपर भी चली जाती है।
 और ऐसा माना जाता है कि इस श्मशान घाट पर कभी भी चिता की आग ठंडी नहीं होती है एक चिता जलती है तो दूसरी तैयार हो जाती है।


 आस्था का यह आयाम आपको कैसा लगा हमें कमेंट के जरिए बताएं और ऐसे स्थानों पर आप आना चाहते हैं या नहीं यह भी हमारे साथ साझा करें अगर इसे प्रत्यक्ष रूप में वीडियो के रूप में अगर देखना चाहते हैं तो हमारे यूट्यूब चैनल रॉयल यात्रा पर विजिट करें।
 उम्मीद करता हूं आज की जानकारी आपको अच्छी लगी होगी रोचक लगी होगी।


धन्यवाद
(लेखन -गौतम राज़)

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