चारधाम यात्रा और इनका रहस्य



 भारत आस्था और मान्यताओं के आधार पर बना हुआ देश है। यहां आपको हर मान्यताओं के मानने वाले लोग हैं और इनका आयाम एवं महत्त्व बहुत बड़ा है।
 चार धाम यात्रा भारत के इन्हीं आस्था के मुख्य केंद्रों में स्थापित है।
 हर सनातन मानने वाले लोग की अंतिम इच्छा चार धाम यात्रा ही रहती है।
  •  आखिर क्यों हर हिंदू चार धाम यात्रा करना चाहते हैं?
  •  क्या महत्व है चार धाम यात्रा की?
  •  आखिर चार धाम यात्रा है क्या?
  •  कहां स्थित है यह चार धाम यात्रा?
  •  क्या होता है चार धाम यात्रा करने से?
  •  अगर कोई चार धाम यात्रा ना करे तो क्या होता है?

चार धाम यात्रा क्या है :-

 चार धाम यात्रा का कोई पौराणिक महत्व या मजबूत साक्ष्य नहीं मिलता है।
 इसका संबंध भारत के महान आचार्य गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया चार मठ है।
 इन मठों का निर्माण का उद्देश्य हिंदू धर्म की एकजुटता और हिंदू विधि व्यवस्था को बनाए रखने हेतु किया गया था।
 इन्हें चार मठों से ही गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन होता है चार मठों के संतो को छोड़कर अन्य किसी को गुरु बनाना हिंदू संत धारा के अधीन नहीं आता है।

 शंकराचार्य जी ने इन मठों की स्थापना के साथ-साथ इनके मठाधिशो की भी नियुक्ति की जो बाद में यही के स्वयं शंकराचार्य कहलाए जाते हैं।
 जो व्यक्ति किसी भी मठ के अंतर्गत संन्यास लेता है वह "दशनामी संप्रदाय" में से किसी एक संप्रदाय पद्धति की साधना करता है।
 इन चार मठों को ही चार धाम यात्रा कहा जाता है।

 यह चार मठ है या चार धाम यात्रा किस प्रकार है :-

  1.  वेदांत ज्ञान मठ (श्री रामेश्वरम):-
 वेदांत ज्ञान मठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम मैं स्थित है इस मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले के नाम के बाद सरस्वती,भारती, पूरी संप्रदाय नाम विशेष लगाया जाता है।

 इन्हें उच्च संप्रदाय का सन्यासी माना जाता है।
इस मठ का महावाक्य "अहं ब्रह्मासी" है और इस मठ को यजुर्वेद क़े अन्तर्गत रखा  है।
 इस्मार्ट के प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वर जी थे, इनका पूर्व नाम मंडन मिश्र था।

 वहीं पर चार धाम यात्रा के प्रमुख धार्मिक स्थान है रामेश्वरम:-
 रामेश्वरम दक्षिण भारत के तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के एक टापू पर स्थित है।
 इसी टापू पर एक डिब्बे ज्योतिर्लिंग है और जैसे उत्तर भारत में काशी का महत्व है ठीक उसी तरह दक्षिण भारत में रामेश्वरम का महत्व है।

रामेश्वरम का पौराणिक महत्व :-

 पौराणिक महत्व की बात करें तो जब राम ने रावण का वध कर सीता को वापस ला रहे थे तब कई ऋषि यों ने यह सलाह दिया कि आपने रावण के रूप में एक ब्राह्मण का वध करने का पाप किया है अतः आपको इसका प्रायश्चित करनाा चाहि
ऋषियों क़े सलाह से ही श्रीराम नें भगवान शंकर की आराधना करने हेतु रामेश्वरम क़े समुद्री किनारो से रेत से शिव लिंग बनाने की कोशिश की परन्तु असफल हो गए।
तब श्रीराम नें हनुमान को हिमालय से शिवलिंग लाने को कहा, परंतु हनुमान जी जब तक शिवलिंग लाते उससे पहले माता सीता ने रेत से ही शिवलिंग बना दिया था।
 यह देख हनुमान जी को बहुत ही गुस्सा आया और तब राम ने हनुमान जी को शांत करने के लिए कहां की तुम सीते द्वारा स्थापित शिवलिंग को हटाकर अपना शिवलिंग स्थापित कर दो, मगर हनुमान जी क़े लाख प्रयास क़े बावजूद शिव लिंग तस से मस ना हो सका।
 तब श्री राम ने हनुमान को समझाते हुए कहा कि तुम्हारे द्वारा लाए हुए शिवलिंग की भी पूजा उतने ही श्रद्धा और सुमन से होगी जितना कि सीते द्वारा स्थापित शिवलिंग।
 इस प्रकार से राम भक्त और हिंदुओं के पवित्र आस्था में से एक श्री रामेश्वरम भी शामिल है।

2. गोवर्धन मठ (श्री जगन्नाथ पूरी) :-

गोवर्धन मठ पूर्वी भारत क़े उड़ीसा राज्य क़े जगन्नाथ पुर मे अवस्थित है।
इस मठ क़े अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासी क़े नाम क़े साथ  (नाम क़े अंत मे) " आरण्य" नाम विशेष जुड़ जाता है। और यह उक्त प्रकार क़े सन्यासी कहलाते है।
इस मठ का महाकाव्य "प्रज्ञानं ब्रह्म" है और यह मठ को ऋग्वेद क़े अन्तर्गत रखा गया है।
'पद्मनाम' इस मठ क़े प्रथम पीठाधीश थे। यह शांकरचाया क़े प्रथम शिष्य थे।

जकगन्नाथपुरी का महत्व :-

जगन्नाथ पूरी उड़ीसा क़े पूरी जिले क़े अन्तर्गत आता है।
जगन्नाथ (पुरे संसार क़े भगवान) सनातन धर्म क़े चार धामों मे से एक़ अति पवित्र धार्मिक स्थल है।
इसकी धार्मिक और दैविक महत्व अत्यंत अधिक है।
साक्षात् समुद्र देव हर रोज़ पूरी क़े जगन्नाथ प्रभु क़े पैर पाखारने आते है।
मान्यता क़े आधार पर बात करे तो जो भी श्रद्धालु जगन्नाथ क़े परिवेश मे 3 रात और 3दिन आश्रय ले लेता है तो वह जीवन-मरण क़े चक्कर से मुक्त हो जाता है।
यही पर अति विशाल शाही यात्रा निकलता है जिसमे जगन्नाथ जी नगर भ्रमण पर निकलते है यह परंपरा अति प्राचीन से चलता आ रहा है।
यहाँ कई मेले भी लगते है।

3. शारदा मठ (द्वारकाधीश) :-

शारदा मठ (कलिका) गुजरात क़े द्वारका मे स्तिथ है। इस मठ क़े अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासी क़े नाम क़े साथ 'तीर्थ' और 'आश्रम' शब्द विशेष जुड़ता है।
फिर इन्हे उक्त श्रेणी क़े सन्यासी माना जाता है।
इस मठ क़े महाकाव्य 'तव्यमसी' है। इस मठ को 'सामवेद' क़े अन्तर्गत रखा गया है। "हस्तामालक" शारदा मठ क़े प्रथम पीठधीश थे,
इसका पूर्व नाम पृथ्वीधर था यह शांकराचार्य क़े प्रथम चार शिष्यों मे से एक़ थे।

द्वारकाधीश मंदिर का महत्व और इतिहास :-

द्वारकाधीश मंदिर जिसे जगत मंदिर भी कहा जाता है, यह मंदिर गुजरात क़े द्वारका मे स्तिथ है।
द्वारकाधीश मंदिर 72 स्तम्भो क़े सहारे पाँच मंजिल वाला अति प्राचीन मंदिर है।
यह मंदिर सनातन धर्म क़े चार धामों मे से एक़ प्रमुख धाम है। यह मंदिर जगत पालनकार श्री कृष्ण को समर्पित है।
जहाँ तक इसकी इतिहास की बात करे तो इस मंदिर का निर्माण स्वयम श्री कृष्ण क़े पर पोते (बेटे का पोता ) वज्रनाभ नें किया था।
यहाँ कृष्ण जी का आवास था वही पर मुख्य मंदिर का निर्माण उन्होंने किया था, किन्तु मंदिर का विस्तार 15वीं -16वीं शदी मे हुआ।
इसके पूर्व 8वीं  सदी  मे गुरु शंकराचार्य का यहां पर आगमन हुआ था।
 पुरातात्विक विभाग के अनुसार यह मंदिर 22 से 25 सौ वर्ष पुराना हो सकता है।

 4. ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) :-

 यह मठ उत्तराखंड के बद्रीनाथ में स्थित है । इस मठ के अंतर्गत दीक्षा लेने वाले सन्यासी के नाम के बाद सागर, गिरी एवं पर्वत लगता है।
 इसके उपरांत उक्त प्रकार के सन्यासी कहलाते हैं।
 स्मार्ट का महावाक्य "आयमात्मा ब्रह्म " है। इस मठ को यथार्थ वेद क़े अन्तर्गत रखा गया है।
 इस्मार्ट के प्रथम मठाधीश  "आचार्य तोटक" बनाये गए थे

बद्रीनाथ मंदिर का महत्व और इतिहास :-


इसकी इतिहास की बात करे तो -

ब्रह्माजी के दो बेटे थे। उनमें से एक का नाम था दक्ष। दक्ष की सोलह बेटियां थी। उनमें से तेरह का विवाह धर्मराज से हुआ था। उनमें एक का नाम था श्रीमूर्ति। उनके दो बेटे थे, नर और नारायण। दोनों बहुत ही भले, एक-दूसरे से कभी अलग नहीं होते थे। नर छोटे थे। वे एक-दूसरे को बहुत चाहते थे। अपनी मां को भी बहुत प्यार करते थे। एक बार दोनों ने अपनी मां की बड़ी सेवा की। माँ खुशी से फूल उठी। बोली, ‘‘मेरे प्यारे बेटा, मैं तुमसे बहुत खुश हूं। बोलो, क्या चाहते हो ? जो मांगोगे वही दूंगी।’’

दोनों ने कहा, ‘‘माँ, हम वन में जाकर तप करना चाहतें है। आप अगर सचमुच कुछ देना चाहती हो, तो यह वर दो कि हम सदा तप करते रहे।’’

बेटों की बात सुनकर मां को बहुत दुख हुआ। अब उसके बेटे उससे बिछुड़ जायंगें। पर वे वचन दे चुकी थीं। उनको रोक नहीं सकती थीं। इसलिए वर देना पड़ा। वर पाकर दोनों भाई तप करने चले गये। वे सारे देश के वनों में घूमने लगे। घूमते-घूमते हिमालय पहाड़ के वनों में पहुंचे।

इसी वन में अलकनन्दा के दोनों किनारों पर दों पहाड़ है। दाहिनी ओर वाले पहाड़ पर नारायण तप करने लगे। बाई और वाले पर नर। आज भी इन दोनों पहाड़ों के यही नाम है। यहां बैठकर दोनों ने भारी तप किया, इतना कि देवलोक का राजा डर गया। उसने उनके तप को भंग करने की बड़ी कोशिश की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। तब उसे याद आया कि नर-नारायण साधारण मुनि नहीं है, भगवान का अवतार है। कहते है, कलियुग के आने तक वे वहीं तप करते रहें। आखिर कलियुग के आने का समय हुआ। तब वे अर्जुन और कृष्ण का अवतार लेने के लिए बदरी-वन से चले। उस समय भगवान ने दूसरे मुनियों से कहा, ‘‘मैं अब इस रूप में यहां नहीं रहूंगा। नारद शिला के नीचे मेरी एक मूर्ति है, उसे निकाल लो और यहां एक मन्दिर बनाओं आज से उसी की पूजा करना।

नारद ने भगवान की बहुत सेवा की थी। उनके नाम पर शिला और कुण्ड़ दोनों है। प्रह्राद की कहानी तो आप लोग ही है। उनके पिता को मारकर जब नृसिंह भगवान क्रोध से भरे फिर रहे थे तब यहीं आकर उनका आवेश शान्त हुआ था। नृसिंह-शिला भी वहां मौजूद है। ब्रह्म-कपाली पर पिण्डदान किया जाता है। दो मील आगे भारत का आखिरी गांव माना जाता है। ढाई मील पर माता मूर्ति की मढ़ी है। पांच मील पर वसुधारा है। वसुधारा दो सौ फुट से गिरने वाला झरना है। आगे शतपथ, स्वर्ग-द्वार और अलकापुरी है। फिर तिब्बत का देश है। उस वन में तीर्थ-ही-तीर्थ है। सारी भूमि तपोभूमि है। वहां पर गरम पानी का भी एक झरना है। इतना गरम पानी हैकि एकाएक पैर दो तो जल जाय। ठीक अलकनन्दा के किनारे है। अलकनन्दा में हाथ दो तो गल जाय, झरने में दो तो जल जाय।

बद्रीनाथ उत्तराखंड क़े चमोली जिला क़े अन्तर्गत आता है।

उम्मीद करता हूँ यह आर्टिकल आपके लिए उपयोगी और ज्ञानवर्धक साबित होगा। धर्म क़े दृष्टिकोण से चार धाम और चार मठ का उल्लेख करना मेरे लिए बहुत की गौरव की बात है किन्तु उतनी की कठिन भी,
कुछ कमी या त्रुटि रही हो तो मुझे क्षमा करे.

धन्यवाद
(लेखन-गौतम राज़)

Post a comment

1 Comments

हाल की पोस्ट्स

परिचय

भारत में परिदृश्य, महान विरासत और संस्कृति, विभिन्न वनस्पतियों और जीवों का असंख्य घर है। यह देश दुनिया भर के पर्यटकों के लिए सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थल है, हम अपने यात्रा के अनुभवों को इस वेबसाइट के माध्यम से साझा करते है |

सोशल मीडिया