सप्तकरणी गुफा और जरासंध का बैठक

 भारत जहां एक तरफ विविधताओं से भरा हुआ देश है, वही अति प्राचीन  ऐतिहासिक तथ्य और स्थान भी इसके साथ जुड़े हुए हैं।
 भारत के मिट्टी के हर कण-कण में इतिहास और ऐतिहासिकता के मठमैले सुगंध आपको मिल जाएंगे।
 आज हम ऐसे ही 2 ऐतिहासिक स्थानों और उनके इतिहास के बारे में बताने वाले हैं जो अति प्राचीन है और भारत के इतिहास में उनका एक महत्वपूर्ण स्थान भी है।

सप्तकरनी गुफा का इतिहास -

 भगवान बुद्ध की ज्ञान और मोक्ष का भूमि है कहे जाने वाला राजगीर भगवान बुद्ध की अनेकों यादों को समेटे हुए एक पवित्र स्थान है।
सप्तकरनी गुफा उन्ही मेसे एक़ प्रमुख पवित्र स्थान है।
बताया जाता है की भगवान बुद्ध अपने अंतिम समय मे सप्तकरनी गुफा मे ही समय व्यतीत किए थे और साधना क़े साथ-साथ अंतिम उपदेश भी यही दिया था।
साथ ही साथ भगवान बुद्ध क़े मृत्यु क़े बाद बौद्ध धर्म का पहला बौद्ध अधिवेशन इसी गुफा मे हुआ था।
इस लिहाज़ से यह स्थान बौद्ध मानने वाले लोगों क़े लिए अति विशेष और अति पवित्र है।

आधुनिक परिवेश मे स्तिथि -

सप्तकरनी गुफा क़े बारे मे यह भी बोला जाता की सुरंग क़े रास्ते उसका जुड़ाव सोनभण्डार गुफा से है जो अभी बंद है।
सप्तकरनी गुफा से इसके सुरंग क़े प्रमाण भी है, मगर थोड़ी अंदर जाने पर यह गुफा बहुत संकरा हो जाता है और ऑक्सीजन की कमी से दम भी घुटने लगाता है।
गुफा मे बने बौद्ध और महावीर जी क़े मूर्ति आज भी थोड़ी बहुत नुकसान क़े साथ आज भी है।

जारसंध का बैठक और इतिहास -

जरासंध का बैठक राजगीर की सबसे प्राचीनतम स्थलों मे से एक़ है।
आपको बताते चले राजगीर पर जारसंध का ही अधिपत्य था।
जरासंध महाभारत काल का एक़ प्रमुख पात्र था और उसमे 10,000 हाथियों जितना शक्ति था।
अपने इसी बाहुबल क़े दम पर उसने आस पास क़े राजाओं को पराजय कर उनका राज्य हड़प लिया था।
और इन सबो की रणनीति जरासंध इसी जगह पर बनाता था।
और इसी स्थान की तब से आज तक जरासंध का बैठक क़े नाम से जाना जाता है।
अभी इसे ऐतिहातन सुरक्षा क़े दृश्टिकोण से ढक दिया गया है।
जरासंध का बैठक ब्रम्ह कुंड क़े ऊपर और सप्तकरनी गुफा वाले रास्ते मे ही पडता है।
सप्तकरनी गुफा जरासंध क़े बैठक वाले रास्ते से 500 मीटर ऊपर है।

धन्यवाद
(लेखन - गौतम राज़)

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